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Maha Vishnu Stotram

samasta papa nashaka stotram
समस्त पापनाशक स्तोत्र
भगवान वेदव्यास द्वारा रचित अठारह पुराणों में से एक ‘अग्नि पुराण’ में अग्निदेव द्वारा महर्षि वशिष्ठ को दिये गये विभिन्न उपदेश हैं। इसी के अंतर्गत इस पापनाशक स्तोत्र के बारे में महात्मा पुष्कर कहते हैं कि मनुष्य चित्त की मलिनतावश चोरी, हत्या, परस्त्रीगमन आदि विभिन्न पाप करता है, पर जब चित्त कुछ शुद्ध होता है तब उसे इन पापों से मुक्ति की इच्छा होती है। उस समय भगवान नारायण की दिव्य स्तुति करने से समस्त पापों का प्रायश्चित पूर्ण होता है। इसीलिए इस दिव्य स्तोत्र का नाम ‘समस्त पापनाशक स्तोत्र’ है।
निम्निलिखित प्रकार से भगवान नारायण की स्तुति करें-
पुष्करोवाच
विष्णवे विष्णवे नित्यं विष्णवे नमः।
नमामि विष्णुं चित्तस्थमहंकारगतिं हरिम्।।
चित्तस्थमीशमव्यक्तमनन्तमपराजितम्।
विष्णुमीड्यमशेषेण अनादिनिधनं विभुम्।।
विष्णुश्चित्तगतो यन्मे विष्णुर्बुद्धिगतश्च यत्।
यच्चाहंकारगो विष्णुर्यद्वष्णुर्मयि संस्थितः।।
करोति कर्मभूतोऽसौ स्थावरस्य चरस्य च।
तत् पापं नाशमायातु तस्मिन्नेव हि चिन्तिते।।
ध्यातो हरति यत् पापं स्वप्ने दृष्टस्तु भावनात्।
तमुपेन्द्रमहं विष्णुं प्रणतार्तिहरं हरिम्।।
जगत्यस्मिन्निराधारे मज्जमाने तमस्यधः।
हस्तावलम्बनं विष्णु प्रणमामि परात्परम्।।
सर्वेश्वरेश्वर विभो परमात्मन्नधोक्षज।
हृषीकेश हृषीकेश हृषीकेश नमोऽस्तु ते।।
नृसिंहानन्त गोविन्द भूतभावन केशव।
दुरूक्तं दुष्कृतं ध्यातं शमयाघं नमोऽस्तु ते।।
यन्मया चिन्तितं दुष्टं स्वचित्तवशवर्तिना।
अकार्यं महदत्युग्रं तच्छमं नय केशव।।
बह्मण्यदेव गोविन्द परमार्थपरायण।
जगन्नाथ जगद्धातः पापं प्रशमयाच्युत।।
यथापराह्ने सायाह्ने मध्याह्ने च तथा निशि।
कायेन मनसा वाचा कृतं पापमजानता।।
जानता च हृषीकेश पुण्डरीकाक्ष माधव।
नामत्रयोच्चारणतः पापं यातु मम क्षयम्।।
शरीरं में हृषीकेश पुण्डरीकाक्ष माधव।
पापं प्रशमयाद्य त्वं वाक्कृतं मम माधव।।
यद् भुंजन् यत् स्वपंस्तिष्ठन् गच्छन् जाग्रद यदास्थितः।
कृतवान् पापमद्याहं कायेन मनसा गिरा।।
यत् स्वल्पमपि यत् स्थूलं कुयोनिनरकावहम्।
तद् यातु प्रशमं सर्वं वासुदेवानुकीर्तनात्।।
परं ब्रह्म परं धाम पवित्रं परमं च यत्।
तस्मिन् प्रकीर्तिते विष्णौ यत् पापं तत् प्रणश्यतु।।
यत् प्राप्य न निवर्तन्ते गन्धस्पर्शादिवर्जितम्।
सूरयस्तत् पदं विष्णोस्तत् सर्वं शमयत्वघम्।।
(अग्नि पुराणः 172.2-98)
माहात्म्यम् –
पापप्रणाशनं स्तोत्रं यः पठेच्छृणुयादपि।
शारीरैर्मानसैर्वाग्जैः कृतैः पापैः प्रमुच्यते।।
सर्वपापग्रहादिभ्यो याति विष्णोः परं पदम्।
तस्मात् पापे कृते जप्यं स्तोत्रं सर्वाघमर्दनम्।।
प्रायश्चित्तमघौघानां स्तोत्रं व्रतकृते वरम्।
प्रायश्चित्तैः स्तोत्रजपैर्व्रतैर्नश्यति पातकम्।।
(अग्नि पुराणः 172.17-29)
अर्थः पुष्कर बोलेः “सर्वव्यापी विष्णु को सदा नमस्कार है। श्री हरि विष्णु को नमस्कार है। मैं अपने चित्त में स्थित सर्वव्यापी, अहंकारशून्य श्रीहरि को नमस्कार करता हूँ। मैं अपने मानस में विराजमान अव्यक्त, अनन्त और अपराजित परमेश्वर को नमस्कार करता हूँ। सबके पूजनीय, जन्म और मरण से रहित, प्रभावशाली श्रीविष्णु को नमस्कार है। विष्णु मेरे चित्त में निवास करते हैं, विष्णु मेरी बुद्धि में विराजमान हैं, विष्णु मेरे अहंकार में प्रतिष्ठित हैं और विष्णु मुझमें भी स्थित हैं।
वे श्री विष्णु ही चराचर प्राणियों के कर्मों के रूप में स्थित हैं, उनके चिंतन से मेरे पाप का विनाश हो। जो ध्यान करने पर पापों का हरण करते हैं और भावना करने से स्वप्न में दर्शन देते हैं, इन्द्र के अनुज, शरणागतजनों का दुःख दूर करने वाले उन पापापहारी श्रीविष्णु को मैं नमस्कार करता हूँ।
मैं इस निराधार जगत में अज्ञानांधकार में डूबते हुए को हाथ का सहारा देने वाले परात्परस्वरूप श्रीविष्णु के सम्मुख नतमस्तक होता हूँ। सर्वेश्वरेश्वर प्रभो ! कमलनयन परमात्मन् ! हृषीकेश ! आपको नमस्कार है। इन्द्रियों के स्वामी श्रीविष्णो ! आपको नमस्कार है। नृसिंह ! अनन्तस्वरूप गोविन्द ! समस्त भूत-प्राणियों की सृष्टि करने वाले केशव ! मेरे द्वारा जो दुर्वचन कहा गया हो अथवा पापपूर्ण चिंतन किया गया हो, मेरे उस पाप का प्रशमन कीजिये, आपको नमस्कार है। केशव ! अपने मन के वश में होकर मैंने जो न करने योग्य अत्यंत उग्र पापपूर्ण चिंतन किया है, उसे शांत कीजिये। परमार्थपरायण, ब्राह्मणप्रिय गोविन्द ! अपनी मर्यादा से कभी च्युत न होने वाले जगन्नाथ ! जगत का भरण-पोषण करने वाले देवेश्वर ! मेरे पाप का विनाश कीजिये। मैंने मध्याह्न, अपराह्न, सायंकाल एवं रात्रि के समय जानते हुए अथवा अनजाने, शरीर, मन एवं वाणी के द्वारा जो पाप किया हो, ‘पुण्डरीकाक्ष’, ‘हृषीकेश’, ‘माधव’ – आपके इन तीन नामों के उच्चारण से मेरे वे सब पाप क्षीण हो जायें। कमलनयन ! लक्ष्मीपते ! इन्द्रियों के स्वामी माधव ! आज आप मेरे शरीर एवं वाणी द्वारा किये हुए पापों का हनन कीजिये। आज मैंने खाते, सोते, खड़े, चलते अथवा जागते हुए मन, वाणी और शरीर से जो भी नीच योनि एवं नरक की प्राप्ति कराने वाले सूक्ष्म अथवा स्थूल पाप किये हों, भगवान वासुदेव के नामोच्चारण से वे सब विनष्ट हो जायें। जो परब्रह्म, परम धाम और परम पवित्र हैं, उन श्रीविष्णु के संकीर्तन से मेरे पाप लुप्त हो जायें। जिसको प्राप्त होकर ज्ञानीजन पुनः लौटकर नहीं आते, जो गंध, स्पर्श आदि तन्मात्राओं से रहित है, श्रीविष्णु का वह परम पद मेरे सम्पूर्ण पापों का शमन करे।”
माहात्म्यः जो मनुष्य पापों का विनाश करने वाले इस स्तोत्र का पठन अथवा श्रवण करता है, वह शरीर, मन और वाणीजनित समस्त पापों से छूट जाता है एवं समस्त पापग्रहों से मुक्त होकर श्रीविष्णु के परम पद को प्राप्त होता है। इसलिए किसी भी पाप के हो जाने पर इस स्तोत्र का जप करें। यह स्तोत्र पापसमूहों के प्रायश्चित के समान है। कृच्छ्र आदि व्रत करने वाले के लिए भी यह श्रेष्ठ है। स्तोत्र-जप और व्रतरूप प्रायश्चित से सम्पूर्ण पाप नष्ट हो जाते हैं। इसलिए भोग और मोक्ष की सिद्धि के लिए इनका अनुष्ठान करना चाहिए।
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मंत्र से आरोग्यता

मंत्र से आरोग्यता

अभी तो वैज्ञानिक भी भारतीय मंत्र विज्ञान की महिमा जानकर दंग रह गये हैं।
शब्दों की ध्वनि का अलग-अलग अंगों पर एवं वातावरण पर असर होता है। कई शब्दों का उच्चारण कुदरती रूप से होता है। आलस्य के समय कुदरती आ… आ… होता है। रोग की पीड़ा के समय ॐ…. ॐ…. का उच्चारण कुदरती ऊँह…. ऊँह…. के रूप में होता है। यदि कुछ अक्षरों का महत्त्व समझकर उच्चारण किया जाय तो बहुत सारे रोगों से छुटकारा मिल सकता है।
‘अ’ उच्चारण से जननेन्द्रिय पर अच्छा असर पड़ता है।

‘आ’ उच्चारण से जीवनशक्ति आदि पर अच्छा प्रभाव पड़ता है। दमा और खाँसी के रोग में आराम मिलता है, आलस्य दूर होता है।

‘इ’ उच्चारण से कफ, आँतों का विष और मल दूर होता है। कब्ज, पेड़ू के दर्द, सिरदर्द और हृदयरोग में भी बड़ा लाभ होता है। उदासीनता और क्रोध मिटाने में भी यह अक्षर बड़ा फायदा करता है।

‘ओ’ उच्चारण से ऊर्जाशक्ति का विकास होता है।
‘म’ उच्चारण से मानसिक शक्तियाँ विकसित होती हैं। शायद इसीलिए भारत के ऋषियों ने जन्मदात्री के लिए ‘माता’ शब्द पसंद किया होगा।

‘ॐ’ का उच्चारण करने से ऊर्जा प्राप्त होती है और मानसिक शक्तियाँ विकसित होती हैं। मस्तिष्क, पेट और सूक्ष्म इन्द्रियों पर सात्त्विक असर होता है।

‘ह्रीं’ उच्चारण करने से पाचन-तंत्र, गले और हृदय पर अच्छा प्रभाव पड़ता है।

‘ह्रं’ उच्चारण करने से पेट, जिगर, तिल्ली, आँतों और गर्भाशय पर अच्छा असर पड़ता है।

औषधि को एकटक देखते हुए ‘ॐ नमो नारायणाय’ मंत्र का 21 बार जप करके फिर औषधि लेने से उसमें भगवद चेतना का प्रभाव आता है और विशेष लाभ होता है।

रात्रि को नींद न आती हो या बुरे स्वप्न आते हों तो सोते समय 15 मिनट भगवन्नाम या
हरिनाम का जप (हरि ॐ….. हरि ॐ…. इस प्रकार गुंजन) करें। फिर ‘शुद्धे-शुद्धे महायोगिनी महानिद्रे स्वाहा।’ इस मंत्र का स्मरण करें। स्मरण करते करते अवश्य अच्छी नींद आयेगी।

तुलसी भरोसे राम के निश्चिंत होई सोय।
अनहोनी होनी नहीं, होनी होय सो होय।।

चिंतित व्यक्ति को अच्छी तरह इसका मनन करना चाहिए। किसी बीमारी के कारण नींद न आती हो तो प्रातः ‘पानी प्रयोग’ करें (आधा से सवा लीटर पानी पीयें) और उपरोक्त प्रयोग करें, अवश्य अच्छी नींद आयेगी। इससे बुरे सपने आने भी बंद हो जायेंगे। फिर भी बुरे सपने आते हों तो सिरहाने के नीचे तीन मोरपंख रखने से भी लाभ होता है।
वृद्ध लोगों को यदि नींद नहीं आती तो रात को बिस्तर पर बैठकर ॐकार का ओ…..म् ऐसा प्लुत उच्चारण करें। फिर जितना समय उच्चारण में लगाया, उतना ही समय चुप हो जायें। ऐसा 10-15 मिनट करें, फिर सीधे सो जायें। ‘नींद नहीं आती’ यह भूल जायें। नींद आये चाहे न आये, उसकी फिक्र छोड़ दें थोड़े ही दिनों में कम नींद आने की शिकायत दूर हो जायेगी और यदि ज्यादा नींद आती होगी तो नपी तुली हो जायेगी। बुरे स्वप्न दूर हो जायेंगे और रात भर भक्ति करने का फल मिलेगा। युवान और बच्चे ‘ॐ हरये नमः।’ मंत्र का जप करके सोयें तो बुरे विचार और बुरे स्वप्न धीरे-धीरे छू होने लगेंगे।
दिन में श्री गुरूगीता का पाठ एवं ‘ॐ हंसं हंसः।’ इस मंत्र का 21 बार जप करके पानी में देखें और उसे पी लें। इससे बेचैनी दूर होगी।
यदि कोई शिशु रात को चौंकता है, उसे नींद नहीं आती, माँ को जगाता है, परेशान रहता है तो उसके सिरहाने के नीचे फिटकरी रख दें। इससे उसे बढ़िया नींद आयेगी।
(धनात्मक ऊर्जा बनाने वाला फिटकरीयुक्त ‘वास्तुदोष निवारक’ प्रसाद आश्रम से निःशुल्क मिलता है। उसे शिशु के सिरहाने के नीचे रखें। उसे अपने घर के कमरों में पश्चिम् दिशा में रखने से ग्रहबाधा की निवृत्ति और सुख शांति में वृद्धि होती है।)
स्रोतः लोक कल्याण सेतु, नवम्बर 2010, पृष्ठ संख्या 3,4 अंक 161
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वे पाप जो प्रायश्चितरहित हैं

धर्मराज (मृत्यु के अधिष्ठाता देव) राजा भगीरथ से कहते हैं- “भूपाल ! जो स्नान अथवा पूजन के लिए जाते हुए लोगों के कार्य में विघ्न डालता है, उसे ब्रह्मघाती कहते हैं। जो परायी निंदा और अपनी प्रशंसा में लगा रहता है तथा जो असत्य भाषण में रत रहता है, वह ब्रह्महत्यारा कहा गया है।
जो अधर्म का अनुमोदन करता है उसे ब्रह्मघात का पाप लगता है। जो दूसरों को उद्वेग में डालता है, चुगली करता है और दिखावे में तत्पर रहता है, उसे ब्रह्महत्यारा कहते हैं।
भूपते ! जो पाप प्रायश्चितरहित हैं, उनका वर्णन सुनो। वे पाप समस्त पापों से बड़े तथा भारी नरक देने वाले हैं। ब्रह्महत्या आदि पापों के निवारण का उपाय तो किसी प्रकार हो सकता है परंतु जो ब्राह्मण अर्थात् जिसने ब्रह्म को जान लिया है ऐसे महापुरुष से द्वेष करता है, उसका पाप से कभी भी निस्तार नहीं होता।
नरेश्वर ! जो विश्वासघाती तथा कृतघ्न हैं उनका उद्धार कभी नहीं होता। जिनका चित्त वेदों की निंदा में ही रत है और जो भगत्कथावार्ता आदि की निंदा करते हैं, उनका इहलोक तथा परलोक में कहीं भी उद्धार नहीं होता।
भूपते ! जो महापुरुषों की निंदा को आदरपूर्वक सुनते हैं, ऐसे लोगों के कानों में तपाये हुए लोहे की बहुत सी कीलें ठोक दी जाती है। तत्पश्चात कानों के उन छिद्रों में अत्यंत गरम किया हुआ तेल भर दिया जाता है। फिर ये कुंभीपाक नरक में पड़ते हैं।
जो दूसरों के दोष बताते या चुगली करते हैं, उन्हें एक सहस्र युग तक तपाये हुए लोहे का पिण्ड भक्षण करना पड़ता है। अत्यंत भयानक सँडसो से उनकी जीभ को पीड़ा दी जाती है और वे अत्यंत घोर निरुच्छवास नामक नरक में आधे कल्प तक निवास करते हैं।
श्रद्धा का त्याग, धर्म कार्य का लोप, इन्द्रियसंयमी पुरुषों की और शास्त्र की निंदा करना महापातक बताया गया है।
जो परायी निंदा में तत्पर, कटुभाषी और दान में विघ्न डालने वाले होते हैं वे महापातकी बताये गये हैं। ऐसे महापातकी लोग प्रत्येक नरक में एक-एक युग रहते हैं और अंत में इस पृथ्वी पर आकर वे सात जन्मों तक गधा होते हैं। तदनंतर वे पापी दस जन्मों तक घाव से भरे शरीर वाले कुत्ते होते हैं, फिर सौ वर्षों तक उन्हें विष्ठा का कीड़ा होना पड़ता है। तदनंतर बारह जन्मों तक वे सर्प होते हैं। राजन ! इसके बाद एक हजार जन्मों तक वे मृग आदि पशु होते हैं। फिर सौ वर्षों तक स्थावर (वृक्ष) आदि योनियों में जन्म लेते हैं। तत्पश्चात् उन्हें गोधा (गोह) का शरीर प्राप्त होता है। फिर सात जन्मों तक वे पापाचारी चाण्डाल होते हैं। इसके बाद सोलह जन्मों तक उनकी दुर्गति होती है। फिर दो जन्मों तक वे दरिद्र, रोगपीड़ित तथा सदा प्रतिग्रह लेने वाले होते हैं। इससे उन्हें फिर नरकगामी होना पड़ता है।
राजन् ! जो झूठी गवाही देता है, उसके पाप का फल सुनो। वह जब तक चौदह इंद्रों का राज्य समाप्त होता है, तब तक सम्पूर्ण यातनाओं को भोगता रहता है। इस लोक में उसके पुत्र-पौत्र भी नष्ट हो जाते हैं और परलोक में वह रौरव तथा अन्य नरकों को क्रमश भोगता है।”
(नारद पुराणः पूर्व भाग-प्रथम पादः अध्याय 15)
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माघ मास का माहात्म्य

माघ मास के माहात्म्य का वर्णन करते हुए कहा गया है कि व्रत दान व तपस्या से भी भगवान श्रीहरि को उतनी प्रसन्नता नहीं होती, जितनी माघ मास में ब्रह्ममुहूर्त में उठकर स्नानमात्र से होती है। अतः सभी पापों से मुक्ति व भगवान की प्रीति प्राप्त करने के लिए प्रत्येक मनुष्य को माघ स्नान व्रत करना चाहिए। इसका प्रारम्भ पौष की पूर्णिमा से होता है।
माघ मास की ऐसी विशेषता है कि इसमें जहाँ कहीं भी जल हो, वह गंगाजल के समान होता है। इस मास की प्रत्येक तिथि पर्व है। कदाचित् अशक्तावस्था में पूरे मास का नियम न ले सकें तो शास्त्रों ने यह भी व्यवस्था की है कि तीन दिन अथवा एक दिन अवश्य माघ-स्नान, दान, उपवास और भगवत्पूजा अत्यंत फलदायी है।
माघ मास के कृष्ण पक्ष की एकादशी षटतिला एकादशी के नाम से जानी जाती है। इस दिन काले तिल, अथवा काली गाय के दान का भी बड़ा माहात्म्य है। तिलमिश्रित जल से स्नान, तिल का उबटन, तिल से हवन, तिलमिश्रित जल का पान व तर्पण, तिल का भोजन, तिल का दान – ये छः कर्म पाप का नाश करने वाले हैं।
माघ मास के कृष्णपक्ष की अमावस्या मौनी अमावस्या के रूप में प्रसिद्ध है। इस पवित्र तिथि पर (26 जनवरी) मौन रहकर अथवा मुनियों के समान आचरणपूर्वक स्नान-दान करने का विशेष महत्त्व है। अमावस्या के दिन सोमवार का योग होने पर उस दिन देवताओं को भी दुर्लभ हो ऐसा पुण्यकाल होता है क्योंकि गंगा, पुष्कर एवं दिव्य अंतरिक्ष और भूमि के जो सब तीर्थ हैं, ये सोमवती (दर्श) अमावस्या के दिन जप, ध्यान, पूजन करने पर विशेष धर्मलाभ प्रदान करते हैं।
सोमवती अमावस्या, रविवारी सप्तमी, मंगलवारी चतुर्थी, बुधवारी अष्टमी – ये चार तिथियाँ सूर्यग्रहण के बराबर कही गयी हैं। इनमें किया गया स्नान, दान व श्राद्ध अक्षय होता है।
माघ शुक्ल पंचमी अर्थात् वसंत पंचमी को सरस्वती माँ का आविर्भाव-दिवस माना जाता है। इस दिन (31 जनवरी को) प्रातः सरस्वती पूजन करना चाहिए। पुस्तक और लेखनी (कलम) में भी देवी सरस्वती का निवासस्थान माना जाता है, अतः उनकी भी पूजा की जाती है।
शुक्ल पक्ष की सप्तमी को अचला सप्तमी कहते हैं। षष्टी के दिन एक बार भोजन करके सप्तमी को सूर्योदय से पूर्व स्नान करने से पाप-नाश, रूप, सुख-सौभाग्य और सदगति प्राप्त होती है।
ऐसे तो माघ की प्रत्येक तिथि पुण्यपर्व है तथापि उनमें भी माघी पूर्णिमा का धार्मिक दृष्टि से बहुत महत्त्व है। इस दिन स्नानादि से निवृत्त होकर भगवत्पूजन, श्राद्ध तथा दान का विशेष फल है। जो इस दिन भगवान शिव की विधिपूर्वक पूजा करता है, वह अश्वमेध यज्ञ का फल पाकर भगवान विष्णु के लोक में प्रतिष्ठित होता है।
माघी पूर्णिमा के दिन तिल, सूती कपड़े, कम्बल, रत्न, पगड़ी, जूते आदि का अपने वैभव के अनुसार दान करके मनुष्य स्वर्गोलोक में सुखी होता है। मत्स्य पुराण के अनुसार इस दिन जो व्यक्ति ब्रह्मवैवर्त पुराण का दान करता है, उसे ब्रह्मलोक की प्राप्ति होती है।
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अपने घर में देख !

सूफी फकीर लोग कहानी सुनाया करते हैं कि प्रभात को कोई अपने खेत की रक्षा करने के लिए जा रहा था। रास्ते में उसे एक गठरी मिली। देखा कि इसमें कंकड़-पत्थर हैं। उसने गठरी ली और खेत में पहुँचा। खेत के पास ही एक नदी थी। वह एक-एक कंकड़-पत्थर गिलोल में डाल-डाल के फेंकने लगा। इतने कोई जौहरी वहाँ स्नान करने आया। उसने स्नान किया तो देखा चमकीला पत्थर…. उठाया तो हीरा ! वह उस व्यक्ति के पास गया जो हीरों को पत्थर समझ के गिलोल में डाल-डाल के फेंक रहा था। उसके पास एक नग बाकी बचा था।
जौहरी ने कहाः ‘पागल ! यह तू क्या कर रहा है? हीरा गिलोल में डालकर फेंक रहा है !”
वह बोलाः “हीरा क्या होता है?”
“यह दे दे, तेरे को मैं इसके 50 रूपये देता हूँ।”
फिर उसने देखा कि “50 रूपये…. इसके ! इसके तो ज्यादा होने चाहिए।”
“अच्छा 100 रूपये देता हूँ।”
“मैं जरा बाजार में दिखाऊँगा, पूछूँगा।”
“अच्छा 200 ले ले।”
ऐसा करते-करते उस जौहरी ने 1100 रूपये में वह हीरा ले लिया। उस व्यक्ति ने रूपये लेकर वह हीरा तो दे दिया लेकिन वह छाती कूट के रोने लगा कि ‘हाय रे हाय’ मैंने इतने हीरे नदी में बहा दिये। मैंने कंकड़ समझकर हीरों को खो दिया। मैं कितना मूर्ख हूँ, कितना बेवकूफ हूँ !”
उससे भी ज्यादा बेवकूफी हम लोगों की है। कहाँ तो सच्चिदानंद परमात्मा, कहाँ तो ब्रह्मा, विष्णु, महेश का पद, कहाँ तो 33 करोड़ देवताओं से भी ऊँचा पद और कहाँ फातमा, अमथा, शकरिया का बाप होना तथा उनकी मोह-माया में जीवन पूरा करके अपने आत्मनाथ से मिले बिना अनाथ होकर श्मशान में जल मरना !
आप शिवाजी से रत्ती भर कम नहीं हैं। आप ब्रह्माजी से तिनका भर भी कम नहीं हैं। आप श्रीकृष्ण से धागा भर भी कम नहीं हैं। आप रामकृष्ण परमहंस जी से एक डोरा भर भी कम नहीं है। आप भगवत्पाद लीलाशाहजी बापू से एक तिल भर भी कम नहीं हैं और आप आसाराम बापू से एक आधा तिल भी कम नहीं हैं।

भगवान कहते हैं-
‘हे अर्जुन ! मैं सब भूतों के हृदय में स्थित सबका आत्मा हूँ।’
(गीताः10.20)
लेकिन चिल्ला रहे हैं- ‘हे कृष्ण ! तू दया कर। हे राम ! तू दया कर। हे अमथा काका ! तू दया कर। हे सेंधी माता ! तू दया कर…’ पर यहाँ क्य है?
इन्सान की बदबख्ती अंदाज से बाहर है।
कमबख्त खुदा होकर बंदा नजर आता है।।
शोधी ले शोधी ले,
निज घरमां पेख, बहार नहि मले।
ढूँढ ले ढूँढ ले, अपने घर में देख अर्थात् अपने में गोता मार और जान ले निज स्वरूप को बाहर नहीं मिलेगा।
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नर को बस करिबौ कहाँ नारायण बस होय

(पूज्य बापूजी के सत्संग प्रवचन से)

अब्दुल रहीम खानखाना एक प्रकार से वे अपनी रियासत के राजा ही थे परंतु हृदय के रहीम (दयालु) थे। वे मुसलिम थे फिर भी भगवान श्रीकृष्ण को अपना इष्टदेव मानते थे।
सन् 1593 की एक घटित घटना है। अकबर ने उन्हें दक्षिण भारत में राज्य-विस्तार के लिए भेजा। रहीम की शूरवीरता देखकर शत्रु राजा ने उनको संदेशा भेजा कि आप मेरे यहाँ पधारो न भोजन करने ! हम मित्रता करें।
जिसका हृदय भक्ति, स्नेह से सम्पन्न हुआ हो, उसे अहंकार बढ़ाकर सत्ता बढ़े ऐसा नहीं लगता। रहीम के जीवन में श्रीकृष्ण की भक्ति थी इसलिए उन्होंने आपसी स्नेह बढ़ाने का न्यौता स्वीकार कर लिया। एक अंगरक्षक को साथ लेकर रहीम उस राजा के यहाँ भोजन करने गये। किले के फाटक के आगे एक बालक खड़ा था, वह बोलाः “ठहरो-ठहरो ! तुम कहाँ जा रहे हो?”
“राजा के यहाँ भोजन करने।”
“नहीं करना भोजन। वापस चले जाओ।”
“ऐ रहीम खानखाना को वापस करने वाले बच्चे ! अभी अक्ल के कच्चे हो। मैंने मित्र को वचन दिया है।”
“फिर भी नहीं जाओ”
“अरे, तुम बोलते हो तो क्या है? कोई रास्ते चलने वाला बच्चा बोल दे- ‘ऐसा नहीं करो’ तो क्या मैं मानने वाला हूँ? मैं अपने सलाहकारों की भी बात इतनी जल्दी नहीं मानता हूँ तो रास्ते जानेवाले बच्चे की मानूँगा?”
बच्चा समझाता गया और रहीम सुनकर आश्चर्य करते गये। बोलेः “तुम इतना आग्रह क्यों कर रहे हो कि मैं भोजन करने न जाऊँ? राजा ने मैत्री के लिए हाथ बढ़ाया है तो हम तो मैत्री में मानते हैं।”
“भले किसी मैत्री-वैत्री में मानो लेकिन मैं बोलता हूँ भोजन करने मत जाओ। राजा ने भोजन में विष मिला दिया है।”
“क्या?”
“हाँ।”
“मैंने वचन दिया है कि मैं भोजन करने आऊँगा। बच्चों की बातें मानकर मैं दिया हुआ वचन तोड़ दूँ और झूठा पडूँ?”
“झूठे पड़ो तो लेकिन भोजन करने मत जाओ। काहे को जा रहे हो मरने?”
रहीम ने दोहा उच्चाराः
अमीं पियाबत मान बिनु, रहिमन हमें न सुहाय।
मान सहित मरिबौ भलौ, जो विष देय पिलाय।।
“यदि कोई बिना मान के अर्थात् बेमन से बुलाकर अमृत पिलाय तो इस प्रकार अपमानित होना हमें नहीं भाता। इसके विपरीत यदि कोई शत्रु आदररहित, प्रेमसहित विष भी पिला दे तो उसे पीकर मरना ज्यादा ठीक समझते हैं।
राजा ने प्रेमपूर्वक मित्रता का हाथ बढ़ाया है तो अब चाहे विष भी दे दे, कोई बात नहीं। मैं तो जाऊँगा।”
“अरे ! क्या जाऊँगा-जाऊँगा? जब मैं बोलता हूँ मत जाओ।”
“ऐ बालक ! इतना अधिकारपूर्वक कैसे बोलता है? मैं तेरी आज्ञा मानने वाला नहीं हूँ।”
“मेरी आज्ञा क्यों नहीं मानोगे? माननी पड़ेगी।”
“रास्ते जानेवाला बच्चा और रहीम से आज्ञा मनवा ले ! बालक ! तू मेरा क्या लगता है कि मैं तेरा आदेश मानूँ? बालक ! तू मेरा क्या लगता है मैं तेरा आदेश मानूँ? क्या तू मेरा इष्टदेव भगवान श्रीकृष्ण है, जो दिया हुआ वचन मैं तोड़ूँ और तेरी बात मानूँ?”
“अगर मैं श्रीकृष्ण ही होऊँ तो?”
“फिर तुम्हारी बात मानूँगा।”
“तो मैं श्री कृष्ण हूँ, बात मान लो।”
“नहीं, बालक रूप में हम विश्वास नहीं करते, प्रकट होकर दिखाओ।”
रास्ता रोकने वाला नन्हा-मुन्ना बालक अपने असली रूप से प्रकट हुआ। भगवान श्रीकृष्ण का दिव्य विग्रह देखकर रहीम घोड़े पर से उतर कर भगवान के चरणों में गिरे तो श्रीकृष्ण अंतर्ध्यान हो गये।
भगवान भक्त के लिए कितना वात्सल्य छलकाते हैं। क्या प़ड़ी थी? नहीं मानता था तो मुआ जाय। पर नहीं। आखिर नहीं जाने दिया तो नहीं जाने दिया।
रहीम ने किले पर चढ़ाई कर दी और देखते-ही-देखते उस धोखेबाज राजा को बंदी बना कर अपने सामने बुलाया। रहीम बोलेः “क्यों ! दोस्ती का हाथ बढ़ाते-बढ़ाते मुझे जहर देकर मारने की साजिश !”
राजा चकित हो गया।
रहीमः “आपने मित्रता की बात कही थी तो मैं आपको मृत्युदंड तो नहीं दूँगा लेकिन धोखा !”
राजाः “मेरा तो अपराध है लेकिन यह आपको पता कैसे चला? मैंने अपने विश्वासू रसोईये से खाना बनवाया और जहर देने की बात उसको भी पता न चले ऐसी मैंने व्यवस्था की थी। आपको किसने बताया?”
“छोड़ो इस बात को।”
“नहीं। भले ही आप मुझे मृत्युदंड दे दो लेकिन यह बात तो मुझे कहो।”
रहीम बोलेः “जो सर्वेश्वर है, परमेश्वर है, प्राणिमात्र का अंतरात्मा है उसको मैं कृष्णरूप में नवाजता हूँ, उसी का मैं सिजदा करता हूँ। वही बालक होकर आया क्योंकि अंदर की आवाज तो मैं मानने को तैयार नहीं था। मैंने बालक रूप में उसकी बात नहीं मानी, तब श्रीकृष्ण ने प्रकट रूप में आदेश दिया तो हमें उसकी बात माननी पड़ी। कैसे हैं इष्टदेव !”
“रहीम ! आपने श्रीकृष्ण की भक्ति का मर्म जाना है। अब चाहे आप मुझे मृत्युदंड दो या जीवनदान दो लेकिन अब यह जीवन श्रीकृष्ण के लिए है।”
“आपका जीवन श्रीकृष्ण के लिए है तो मैं आपके लिए और आप मेरे लिए।” रहीम ने राजा को गले लगा लिया और दोनों उस दिन से सच्चे मित्र बन गये।
रहीम बड़े उच्चकोटि के भक्तकवि थे। उन्होंने भगवदभक्ति, नीति आदि अनेक विषयों पर सागर्भित दोहे रचे जो समाज में आज भी लोकप्रिय हैं।
रहीम कहते हैं-
रहिमन मन ही लगाय के, देखि लऊकिन कोय।
नर को बस करीबौ कहाँ, नारायण बस होय।।
रहिमन रोइबो कौन विधि, हँसिबो कौन विचार।
गये सो आवन को नहीं, रहे सो जावनहार।।
इस संसार के लिए हँसना रोना क्या?
प्रीतम छवि नैनन बसी, पर छवि कहाँ समाय।
भरी सराय रहीम लखि, पथिक आप फिरि जाय।।
एक बार इन आँखों में प्रियतम बस गया तो वहाँ किसी और के लिए कोई स्थान नहीं रहता। सराय में स्थान नहीं होता तो लोग स्वतः ही लौट जाते हैं।

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संत के अपमान का फल

(पूज्य बापू जी के सत्संग प्रवचन से)
सेमिका महर्षि का आज्ञाकारी शिष्य था गौरमुख। मन में सुख आये तो उसको देखे, दुःख आये तो देखे, बीमारी आये तो देखे, तंदुरुस्ती आये तो देखे, – इन सबको जाननेवाला जो परमात्म है वही मेरा आत्मा है और वह सर्वव्यापक है। सदगुरू से ऐसी ऊँची साधना सीखकर गौरमुख एक जंगल में आश्रम बनाकर रहता था।
गौरमुख के शिष्य वेदपाठ करते समय कभी गलती से कोई स्वर गलत उच्चारित कर देते तो चैतन्य परमात्मा पक्षियों के मुख से वेदोच्चारण की गलती ठीक करवा देते, सुधरवा देते थे। उनकी गुरुभक्ति का प्रभाव ऐसा था।
एक दिन क्या हुआ, उस देश का राजा दुर्जय विचरण करता हुआ वहाँ आया। गौरमुख ने देखा कि राजा ने अपने पूरे सैन्यसहित मेरे आश्रम में प्रवेश किया है।
गौरमुख ने कहाः “राजन ! आपका स्वागत है, आपकी सेना और सेनापतियों का भी स्वागत है।” राजा दुर्जय सेनापति सहित महर्षि के विशाल आश्रम में प्रविष्ट हुआ।
अपनी सेना, अंगरक्षकों और दर्जनों बंदूकधारियों को लेकर किसी संत के पास जाना, संत की कुटिया की तरफ घुसना, यह नीच बुद्धि का परिचायक है।
हकीकत में गौरमुख को कहना चाहिए था कि ‘राजन ! आप आये तो अच्छी बात है लेकिन सेना की इस आश्रम में जरूरत नहीं है। सेना आश्रम के बाहर होनी चाहिए थी। खैर आ गयी है तो ठीक है। आप इन्हें आज्ञा कर दीजिये कि बाहर विश्राम करें।’ स्वागत है बोल दिया तो उनके खाने पीने की, रहने की व्यवस्था का जिम्मा सिर पर आ गया। गौरमुख ने सोचा कि “मैंने स्वागत किया है तो अब इनके खाने पीने, रहने की व्यवस्था भी तो मुझे करनी पड़ेगी।”
उसने भगवान विष्णु का चिंतन किया और प्रार्थना की ‘हे प्रभु ! अब क्या करूँ ? दुर्जय राजा सेना सहित आये हैं, उनका स्वागत करना है।’ अपने लिए कुछ न माँगने वाले, निर्दोष गौरमुख की प्रार्थना पर सोऽहं स्वभाव अंतर्यामी परमेश्वर ने उसके आगे प्रकट होकर उसे चिंतन करने मात्र से कार्यसिद्धि प्रदान करने वाली चिंतामणि दी और कहा कि “तुम इसके आगे जो भी चिंतन करोगे, चाहोगे उसकी सब व्यवस्था चिंतामणि कर देगी।
गौरमुख ने चिंतामणि के सामने बैठकर कहाः “हे नारायण की दी हुई प्रसादी ! मेरे आश्रम में इन सेनापतियों के रहने योग्य जगह बन जाय और सेना के योग्य भोजन बन जाय। घोड़ों के लिए दाना, हाथियों के लिए चारा और राजा के लिए उनके अनुरूप निवास व भोजन बन जाये।”
गौरमुख चिंतामणि के आगे चिंतन करते गये और खूब सारी व्यवस्था हो गयी। यह देखकर दुर्जय राजा दंग रह गया। इतनी आवभगत करने वाले मुनि को मस्का मारते हुए राजा ने कहाः “मुनि ! आपने हमें स्वागत-सत्कार से खूब प्रसन्न किया है। आप भी कभी हमारे अतिथि बनिये।”
अब मेहमान बनाकर वह अपना अहंकार दिखाना चाहता था। इन्होंने तो अतिथि समझकर उसका स्वागत किया लेकिन उस अहंकारी राजा की नीयत खराब हो गयी। अगले दिन जब राजा सेना सहित वहाँ से जाने लगा तो मणि की बनायी हुई सभी चीजें गायब हो गयीं। यह सब सम्भव है। ऐसे संतों के बारे में मैंने सुना है। समर्थ रामदासजी और तुकारामजी भी सब प्रकट कर देते थे। भारद्वाज ऋषि ने भी भरत के स्वागत में उनके साथ आयी हुई सारी जनता का यथायोग्य स्वागत करने वाली सामग्री प्रकट कर दी थी। अभी भी ऐसे सिद्धपुरुष हैं, जो अपने शिष्यों के साथ विचरण करते हैं और जहाँ मौज आ गयी वहाँ शिष्यों को कहते हैं, ‘यहाँ लगा लो तम्बू।’ सारी व्यवस्था हो जाती है, सारी चीजें आ जाती हैं और जितने दिन रहना है रहे, फिर गुरु जी बोलते हैं, ‘चलो !’ जब वहाँ से चलते हैं तो सारी सामग्री पंचभूतों में विलय हो जाती हैं। ऐसे महापुरुष से मेरी मुलाकात हुई थी, जिनके लिए स्वयं नर्मदाजी भोजन लेकर आती थीं।
राजा उस मणि की शक्ति को देख आश्चर्यचकित रह गया। दुर्जय की दुर्मति ने मंत्री को आज्ञा दीः “जाओ ! गौरमुख को बोलो कि चिंतामणि हमें दे दे। वह चिंतामणि बड़ी प्रभावशाली है। उस साधु को क्या जरूरत है उसकी !”
हरामी लोग साधु को तो कंगला देखने चाहते हैं और सब चीजें अपने अधीन करना चाहते हैं। भगवान के भक्त और प्यारों को पराधीन रखना चाहते हैं और वे अहंकारी, घमंडी आतंकवादियों से डरते रहते हैं। गौरमुख ने मंत्री को संदेश देकर वापस भेज दिया कि ‘भगवान के द्वारा दिया गया ऐसा उपहार स्वार्थपूर्ति के लिए नहीं होता। उसका उपयोग केवल समाजहित के लिए ही होना चाहिए।’
संदेश सुनकर राजा बहुत क्रोधित हुआ और उसने गौरमुख के आश्रम में अपनी सेना भेजकर मणि को बलपूर्वक लाने की आज्ञा दी।
गौरमुख ने देखा कि राजा आतंकी हो रहा है, पोषक शोषक हो रहा है तो उन्होंने भगवान से प्रार्थना कीः ‘हे नारायण ! रक्षमाम्… रक्षमाम्… ! प्रभु जी ! यह क्या हो रहा है ? यह सैन्य अंदर घुस रहा है !… प्रभु ! अपने सैन्य से ठीक करा दो।’
उन्होंने चिंतामणि के आगे अस्त्र-शस्त्रों मे सुसज्जित एक विशाल सेना का चिंतन किया और वह प्रकट हुई, जिससे निमेष भर में दुर्जय का सैन्य धूल चाटता हुआ चला गया। जब दुर्जय और उसके खास मंत्री सैनिकों के साथ गौरमुख के आश्रम पर पहुँचे तब गौरमुख ने भगवान नारायण का पुनः स्मरण किया। ईश्वरीय सत्ता ने मात्र एक निमेष (एक बार पलक झपकने में जितना समय व्यतीत होता है) में सुदर्शन चक्र द्वारा सेनासहित दुर्जय को नष्ट कर डाला।
भगवान बोलेः “महर्षि ! इन वन में सारे दुष्ट एक निमेष में ही नष्ट हो गये हैं इसलिए लोग इसे नैमिषारण्य क्षेत्र के नाम से जानेंगे। इस पुण्यभूमि में ऋषियों, मुनियों का समुचित निवास होगा और सत्संग, ज्ञानचर्चा व ध्यान उपासना होगी।”
तब से उस जगह का नाम नैमिषारण्य पड़ा। यह वही जगह है जहाँ सूत जी ने शौनकादि महामुनियों को श्रीमद भागवत सुनाया।
नैमिषारण्य आज भी हमें संदेश देता है कि जो अपनी शक्ति का अहंकार व योग्यता का दुरूपयोग करके महापुरुषों का अपमान करता है, उसका दैत्यों, मानवों और देवताओं पर भी विजय प्राप्त करने वाले महाप्रतापी राजा दुर्जय की तरह निश्चित ही सर्वनाश होता है।
स्रोतः ऋषि प्रसाद, नवम्बर 2010, पृष्ठ संख्या 16,17, अंक 215
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धर्मक्षेत्रे कुरूक्षेत्रे: श्रीमदभगवदगीता जयंती

जीवन का दृष्टिकोण उन्नत बनाती है ‘गीता’

(श्रीमदभगवदगीता जयंतीः 17 दिसम्बर 2010)

(पूज्य बापू जी की सारगर्भित अमृतवाणी)

‘यह मेरा हृदय है’ – ऐसा अगर किसी ग्रंथ के लिए भगवान ने कहा तो वह गीता का ग्रंथ है। गीता में हृदयं पार्थ। ‘गीता मेरा हृदय है।’ अन्य किसी ग्रंथ के लिए भगवान ने यह नहीं कहा है कि ‘यह मेरा हृदय है।’

भगवान आदिनारायण की नाभि से हाथों में वेद धारण किये ब्रह्माजी प्रकटे, ऐसी पौराणिक कथाएँ आपने-हमने सुनी, कही हैं। लेकिन नाभि की अपेक्षा हदय व्यक्ति के और भी निकट होता है। भगवान ने ब्रह्माजी को तो प्रकट किया नाभि से लेकिन गीता के लिए कहते हैं।

गीता में हृदयं पार्थ। ‘गीता मेरा हृदय है।’

परम्परा तो यह है कि यज्ञशाला में, मंदिर में, धर्मस्थान पर धर्म-कर्म की प्राप्ति होती है लेकिन गीता ने गजब कर दिया – धर्मक्षेत्रे कुरूक्षेत्रे… युद्ध के मैदान को धर्मक्षेत्र बना दिया। पद्धति तो यह थी कि एकांत अरण्य में, गिरि-गुफा में धारणा, समाधि करने पर योग प्रकट हो लेकिन युद्ध के मैदान में गीता ने योग प्रकटाया। परम्परा तो यह है कि शिष्य नीचे बैठे और गुरू ऊपर बैठे। शिष्य शांत हो और गुरू अपने-आप में तृप्त हो तब तत्त्वज्ञान होता है लेकिन गीता ने कमाल कर दिया है। हाथी चिंघाड़ रहे हैं, घोड़े हिनहिना रहे हैं, दोनों सेनाओं के योद्धा प्रतिशोध की आग में तप रहे हैं। किंकर्तव्यविमूढ़ता से आक्रान्त मतिवाला अर्जुन ऊपर बैठा है और गीताकार भगवान नीचे बैठे हैं। अर्जुन रथी है और गीताकार सारथी हैं। कितनी करूणा छलकी होगी उस ईश्वर को, उस नारायण को अपने सखा अर्जुन व मानव-जाति के लिए ! केवल घोड़ागाड़ी ही चलाने को तैयार नहीं अपितु आज्ञा मानने को भी तैयार ! नर कहता है कि ‘दोनों सेनाओं के बीच मेरे रथ को ले चलो।’ रथ को चलाकर दोनों सेनाओं के बीच लाया है। कौन ? नारायण। नर का सेवक बनकर नारायण रथ चला रहा है और उसी नारायण ने अपने वचनों में कहाः
गीता में हृदयं पार्थ।

पौराणिक कथाओं में मैंने पढ़ा है, संतों के मुख से मैंने सुना है, भगवान कहते हैं- “मुझे वैकुण्ठ इतना प्रिय नहीं, मुझे लक्ष्मी इतनी प्रिय नहीं, जितना मेरी गीता का ज्ञान कहने वाला मुझे प्यारा लगता है।” कैसा होगा उस गीताकार का गीता के प्रति प्रेम !

गीता पढ़कर 1985-86 में गीताकार की भूमि को प्रणाम करने के लिए कनाडा के प्रधानमंत्री मि. पीअर टुडो भारत आये थे। जीवन की शाम हो जाये और देह को दफनाया जाये उससे पहले अज्ञानता को दफनाने के लिए उन्होंने अपने प्रधानमंत्री पद से त्यागपत्र दे दिया और एकांत में चले गये। वे अपने शारीरिक पोषण के लिए एक दुधारू गाय और आध्यात्मिक पोषण के लिए उपनिषद् और गीता साथ में ले गये। टुडो ने कहा हैः “मैंने बाइबल पढ़ी, एंजिल पढ़ी और अन्य धर्मग्रन्थ पढ़े। सब ग्रंथ अपने-अपने स्थान पर ठीक हैं किंतु हिन्दुओं का यह श्रीमद भगवदगीता ग्रंथ तो अदभुत है। इसमें किसी मत-मजहब, पंथ या सम्प्रदाय की निंदा स्तुति नहीं है वरन् इसमें तो मनुष्य मात्र के विकास की बाते हैं। गीता मात्र हिन्दुओं का ही धर्मग्रन्थ नहीं है, बल्कि मानवमात्र का धर्मग्रन्थ है।”
गीता ने किसी मत, पंथ की सराहना या निंदा नहीं कि अपितु मनुष्यमात्र की उन्नति की बात कही। और उन्नति कैसी ? एकांगी नहीं, द्विअंगी नहीं, त्रिअंगी नहीं सर्वांगीण उन्नति। कुटुम्ब का बड़ा जब पूरे कुटुम्ब की भलाई का सोचता है तब ही उसके बड़प्पन की शोभा है। और कुटुम्ब का बड़ा तो राग-द्वेष का शिकार हो सकता है लेकिन भगवान में राग-द्वेष कहाँ ! विश्व का बड़ा पूरे विश्व की भलाई सोचता है और ऐसा सोचकर वह जो बोलता है वही गीता का ग्रंथ बनता है।
पर कैसा है यह ग्रंथ ! थोड़े ही शब्दों में बहुत सारा ज्ञान बता दिया और युद्ध के मैदान में भी किसी विषय को अछूता ने छोड़ा। है तो लड़ाई का माहौल और तंदरूस्ती की बात भी नहीं भूले !

युक्ताहारविहारस्य युक्तचेष्टस्य कर्मसु।
युक्तस्वप्नावबोधस्य योगो भवति दुःखहा।।

‘दुःखों का नाश करने वाला योग तो यथायोग्य आहार-विहार करने वाले का, कर्मों में यथायोग्य चेष्टा करने वाले का और यथायोग्य सोने तथा जागने वाले का ही सिद्ध होता है।’
(गीताः 6.17)

केवल शरीर का स्वास्थ्य नहीं, मन का स्वास्थ्य भी कहा है।
सुखं वा यदि वा दुःखं स योगी परमो मतः।

सुखद स्थिति आ जाये चाहे दुःखद स्थिति आ जाय, दोनों में विचलित न हों। दुःख पैरों तले कुचलने की चीज है और सुख बाँटने की चीज है। दृष्टि दिव्य बन जाये, फिर आपके सभी कार्य दिव्य हो जायेंगे। छोटे से छोटे व्यक्ति को अगर सही ज्ञान मिल गया और उसने स्वीकार कर लिया तो वह महान बन के ही रहेगा। और महान से महान दिखता हुआ व्यक्ति भी अगर गीता के ज्ञान के विपरीत चलता है तो देखते देखते उसकी तुच्छता दिखाई देने लगेगी। रावण और कंस ऊँचाइयों को तो प्राप्त थे लेकिन दृष्टिकोण नीचा था तो अति नीचता में जा गिरे। शुकदेव जी, विश्वामित्र जी साधारण झोंपड़े में रहते हैं, खाने-पीने का ठिकाना नहीं लेकिन दृष्टिकोण ऊँचा था तो राम लखन दोनों भाई विश्वामित्र की पगचम्पी करते हैं।

गुरु तें पहिलेहिं जगतपति जागे रामु सुजान।
(श्री रामचरित. बा.कां. 226)

विश्वामित्रजी जगें उसके पहले जगपति जागते हैं क्योंकि विश्वामित्रजी के पास उच्च विचार है, उच्च दृष्टिकोण है। ऊँची दृष्टि का जितना आदर किया जाय उतना कम है। और ऊँची दृष्टि मिलती कहाँ से है ? गीता जैसे ऊँचे सदग्रंथों से, सतशास्त्रों से और जिन्होंने ऊँचा जीवन जिया है, ऐसे महापुरुषों से। बड़े-बड़े दार्शनिकों के दर्शनशास्त्र हम पढ़ते हैं, हमारी बुद्धि पर उनका थोड़ा सा असर होता है लेकिन वह लम्बा समय नहीं टिकता। लेकिन जो आत्मनिष्ठ धर्माचार्य हैं, उनका जीवन ही ऐसा ऊँचा होता है कि उनकी हाजिरीमात्र से लाखों लोगों का जीवन बदल जाता है। वे धर्माचार्य चले जाते हैं तब भी उनके उपदेश से धर्मग्रन्थ बनता है और लोग पढ़ते-पढ़ते आचरण में लाकर धर्मात्मा होते चले जाते हैं।

मनुष्यमात्र अपने जीवन की शक्ति का एकाध हिस्सा खानपान, रहन-सहन में लगाता है और दो तिहाई अपने इर्द गिर्द के माहौल पर प्रभाव डालने की कोशिश में ही खर्च करता है। चाहे चपरासी हो चाहे कलर्क हो, चाहे तहसीलदार हो चाहे मंत्री हो, प्रधानमंत्री हो, चाहे बहू हो चाहे सास हो, चाहे सेल्समैन हो चाहे ग्राहक हो, सब यही कर रहे हैं। फिर भी आम आदमी का प्रभाव वही जल में पैदा हुए बुलबुले की तरह बनता रहता है और मिटता रहता है। लेकिन जिन्होंने स्थायी तत्त्व में विश्रांति पायी है, उन आचार्यों का, उन ब्रह्मज्ञानियों का, उन कृष्ण का प्रभाव अब भी चमकता-दमकता दिखाई दे रहा है।

ख्वाजा दिल मुहम्मद ने लिखाः “रूहानी गुलों से बना यह गुलदस्ता हजारों वर्ष बीत जाने पर भी दिन दूना और रात चौगुना महकता जा रहा है। यह गुलदस्ता जिसके हाथ में भी गया, उसका जीवन महक उठा। ऐसे गीतारूपी गुलदस्ते को मेरा प्रणाम है। सात सौ श्लोकरूपी फूलों से सुवासित यह गुलदस्ता करोड़ों लोगों के हाथ गया, फिर भी मुरझाया नहीं।”

इतना ही नहीं महात्मा थोरो भी गीता के ज्ञान से प्रभावित हो के अपना सब कुछ छोड़कर अरण्यवास करते हुए एकांत में कुटिया में बनाकर जीवन्मुक्ति का आनन्द लेते थे। उनके शिष्य आकर देखते कि उनके गुरू के आसपास कहीं साँप घूमते हैं तो कहीं बिच्छू, फिर भी उन्हें कुछ भय नहीं, चिंता नहीं, शोक नहीं ! एक शिष्य ने आते ही प्रार्थना की कि “गुरूवर ! आप मुझे आज्ञा दीजिये, मैं आपको सुरक्षित जगह पर ले जाऊँ।”

जिनका साहित्य गांधी जी भी आदर से पढ़ते थे, ऐसे महात्मा थोरो हँस पड़े। बोलेः “मेरे पास गीता का अदभुत ग्रंथ होने से मैं पूर्ण सुरक्षित हूँ और सर्वत्र आत्मदृष्टि से निहारता हूँ। मैंने आत्मनिष्ठा पा ली है, जिससे सर्प मेरा कुछ नहीं बिगाड़ सकता। गीता के ज्ञान की ऐसी महिमा है कि मैं निर्भीक बन गया हूँ। वे मुझसे निश्चिंत है और मैं उनसे निश्चिंत हूँ।”
जीवन का दृष्टोकोण उन्नत बनाने की कला सिखाती है गीता ! युद्ध में जैसे घोर कर्मों में भी निर्लप रहना सिखाती है गीता ! कर्तव्यबुद्धि से ईश्वर की पूजारूप कर्म करना सिखाती है गीता ! मरने के बाद नहीं, जीते जी मुक्ति का स्वाद दिलाती है गीता !

स्रोतः ऋषि प्रसाद, नवम्बर 2010, पृष्ठ संख्या 4,5,6 अंक 215
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