Archive for category Vedic science & Religious Significance

Life Energy & Spiritual Music


Development of Life Energy
The Effect of Music:
The classical music composers of the world are generally found to have a longer life span. The mystery behind it is that the music raises the life energy. Not only can one get this benefit by listening to music, but one also gets the benefit even when the ears are plugged, because the sound waves of the music vibrate the listener’s body which also raises the life energy. Thus music is useful for sound health too.

The natural sound of waterfalls and streams also enhances life energy, as do the chirping and singing of birds. There is an exception to this rule however. The popular rock and pop music of the western world actually diminishes the life energy of the performer and the listener. Dr Diamond proved through experiments of biokinesiology that the deltoid muscle of an ordinary man’s hand can lift 40-45 Kg of weight, but where rock music is being played, then its capability to lift weight gets reduced to only 10-15 Kg. Thus rock music diminishes the life energy, whereas the sound of pure, pious, classical music and natural sounds raise the life energy.

(Contd. from the previous issue)

from ashram.org Rishi prasad

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जीवन परिवर्तक प्राणोपासना

भारतीय संस्कृति व उसके आस्था केन्द्रों पर आक्रमण पर आक्रमण किये जा रहे है। इसलिए संस्कृति प्रेमियों का सजग होकर विवेकबलवर्धक आत्मज्ञान के सत्संग तथा प्राणबलर्धक ॐकार के जप व ॐकार संयुक्त प्राणायाम का अवलम्बन लेना आवश्यक हो गया है।

इस सगर्भा प्राणायाम से प्राणशक्ति का विकास होता है। शास्त्रों में कहा गया है कि मन, प्राण और वीर्य इन तीनों में से एक को वश में कर लिया जाय तो शेष दो अपने-आप वश में हो जाते हैं। जिसने प्राण वश में कर लिये, समझ लो उसका मन वश हो गया है। मन की स्थिरता से आध्यात्मिक लाभ और वीर्य की स्थिरता से लौकिक-पारलौकिक लाभ सुनिश्चित है।

वैज्ञानिक दृष्टि से प्राणायाम का बहुत महत्त्व है। एक फेफड़े में तीस करोड़ वायुकोष्ठिकाएँ (अल्वीओलाई) होती हैं (टेक्सट बुक ऑफ मेडिकल फिजियोलोजी, पृष्ठ 496, लेखक – गायटन एण्ड हॉल), उनके द्वारा समस्त शरीर में शुद्ध रक्त का प्रसार होता है। प्राणायाम करने से वायु रूककर भीतर जाती है, वह बड़े वेग से फेफड़ों में प्रवेश करती है। इससे उन वायुकोष्ठिकाओं में जो मल आदि ठहरे होते हैं, वे दूर हो जाते हैं और रक्त भी वहाँ से शुद्ध होकर संचालित होता है। त्रिबंध के साथ प्राणायाम विशेष लाभदायी है।

त्रिबंध के लाभ

जालंधर बंधः
मन को स्थिरता प्राप्त होती है।
मानसिक तनाव, चिंता, क्रोध पर नियंत्रण रखने की क्षमता का विकास होता है।
मूल बंधः
ब्रह्मचर्य पालन, ओजवृद्धि तथा कुंडलिनी के जागरण में सहायक है।
जालंधर बंध के लाभ द्विगुणित हो जाते है।
गुदाद्वार की मांसपेशियों को शक्ति प्रदान करता है। आँतों के वक्र प्रदेशों को उत्प्रेरित करता है।
अपचन को दूर करता है। बवासीर को ठीक करने में सहायक है।
उड्डीयान बंधः
उदर के सभी अंगों को व्यवस्थित करके उनकी क्रियाशीलता बढ़ाता है। यकृत (लीवर), फेफड़े, गुर्दे (किडनी) व तिल्ली की मालिश करता है तथा इनसे संबंधित रोगों को दूर करता है।
परेशानी व चिंता की अवस्था से मन को उबारकर स्थिरता प्रदान करता है।
सुषुम्ना नाड़ी की ओर प्राण के प्रवाह को विशेषरूप से प्रोत्साहित करता है।
सगर्भा त्रिबंध प्राणायाम की विधिः
विद्युत-कुचालक कोमल आसन (कम्बल आदि) बिछाकर उस पर सिद्धासन, पद्मासन या सुखासन में बैठ जायें। मन में ॐकार या गुरूमंत्र का जप करें। दोनों नथुने अवरोधरहित हो जायें इसलिए बायें नथुने से श्वास लें, दायें से छोड़े तथा दायें से लें, बायें से छोड़ें। ऐसा दस बार करें।
अब मूल बंध लगा लें। (शौच करने की इन्द्रिय गुदाद्वार को अंदर की ओर सिकोड़कर ऊपर पेट की ओर खींचकर रखें) और उड्डीयान बंध भी लगा लें। (पेट को अंदर खींच लें।) दोनों नथुनों से अधिक से अधिक गहरा श्वास ले के जालन्धर बंध (ठोड़ी से कंठकूप पर दबाव डालें) लगा लें। मानसिक जप करते हुए एक से सवा मिनट तक श्वास को अंदर रोके रखें। फिर जालन्धर बंध खोलकर धीरे धीरे नथुनों से श्वास छोड़ दें। मूल बंध व उड्डीयान बंध भी खोलकर कुछ सेकंड सामान्य श्वास-प्रश्वास करें। पुनः ये दोनों बंध लगाकर दोनों नथुनों से श्वास पूरी तरह बाहर निकाल दें और जालंधर बंध लगा के इस स्थिति में 40 सेकन्ड तक रहें। तत्पश्चात् तीनों बंध खोलकर नथुनों से श्वास लें। यह एक प्राणायाम हुआ। इस पूरी प्रक्रिया के दौरान आँखें आधी खुली-आधी बंद रहें। मंत्रसहित ऐसे प्राणायाम करें। तीन से शुरू कर संख्या बढ़ाते हुए अंत में ऐसे दस प्राणायाम रोज करने चाहिए। कुछ ही दिन के अभ्यास से जीवन में महान परिवर्तन देखने को मिलेगा।
स्रोतः लोक कल्याण सेतु, नवम्बर 2010, पृष्ठ संख्या 10,11 अंक 161
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The Importance of Namaskara

Salutation is an integral part of courteous demeanour and is
paramount among human virtues. It includes humility,
respect, reverence, sevā and self-surrender. One should
respectfully bow down to Superiors.

For the vital airs of a young
man mount upwards to leave his body when an elder
approaches; but by rising to meet him and saluting he
recovers them. He who habitually pays reverence to and
constantly serves the aged, obtains an increase of four
things, viz. length of life, knowledge, fame and strength.‟
(2.120-121)

A scripture named Ahnik Sutravali has elucidated on the virtues of Sāshtānga ors. Thistrait should be inculcated in children from the very early age. In the Indian ethos salutation is not merely a part of etiquette but has religious connotations as well.

Manu Maharaj has said:
„Chest, head, eyes, mind, words, hands, feet and knees – the salutation (pranāma) using these eight (ashta) organs (angas) is called Sāshtānga Pranāma.‟

In Sāshtānga Pranāma, the entire body is in a state of self-surrender and we offerourselves to the Supreme Lord. This is an excellent way of expressing our gratitude toGod. Sāshtānga Pranāma purges our heart of egoism and ill feelings and makes it pious and pure.‟
As per a scripture called: „Paithinasi Kullookbhattiya‟

„One should salute by touching the other one‟s left and right foot with the left and right hand respectively of his own.‟

When the venerable superior places his hand on the head, shoulder or back of the one touching the feet, the electromagnetic energy flowing through both completes a circle.
With this, the virtues and ojas of the superior person start flowing to the other one as well.
We should avail ourselves of this benefit by paying obeisances to parents and noble souls during the days of Diwali. In case of the holy personages who do not let their feet be touched, one should reverentially pay obeisances to them by bowing his head from a
distance so as to be benefited by their pious glance and auspicious resolve

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